Vaisheshik Darshan Kadad Chapter 1 Part 2

 



कणाद का वैशेषिक दर्शन 1.2

कणाद का वैशेषिक दर्शन 1.2

कारणाभावात्कार्याभावः
अर्थ : यदि कारण नहीं है, तो उसके अनुसार कार्य का भी अभाव होगा। यह कारण और कार्य के अनिवार्य सम्बन्ध को बताता है।
न तु कार्याभवात्कारणाभावः
अर्थ : केवल कार्य के अभाव से कारण के अभाव का अनुमान नहीं लगाया जा सकता। कारण के अस्तित्व की स्वतंत्रता है।
सामान्यं विशेष इति बुद्ध्यपेक्षम्
अर्थ : सामान्य और विशेष की पहचान बुद्धि और परिस्थिति पर निर्भर करती है। समान्य वह है जो सभी में पाया जाता है, विशेष वह जो कुछ में विशिष्ट है।
भावः सामान्यं एव
अर्थ : किसी भी वस्तु का भाव हमेशा सामान्य रूप से होता है, यानी उसकी प्रकृति में एक सामान्यता निहित होती है।
द्रव्यत्वं गुणत्वं कर्मत्वं च सामान्यानि विशेषाश्च
अर्थ : द्रव्य, गुण और कर्म ये सामान्य रूप से विद्यमान हैं, और इनके अलावा विशेषताएँ भी अलग से पाई जाती हैं।
अन्यत्रान्त्येभ्यो विशेषेभ्यः
अर्थ : किसी वस्तु की विशेषता अन्य वस्तुओं से भिन्न होती है, यानी विशेषता वस्तु-विशेष पर निर्भर करती है।
सदिति यतो द्रव्यगुणकर्मसु
अर्थ : द्रव्य, गुण और कर्म में ‘सत्’ अर्थात् वास्तविकता निहित रहती है। यही इनके अस्तित्व का आधार है।
द्रव्यगुणकर्मभ्योऽर्थान्तरं सत्ता
अर्थ : द्रव्य, गुण और कर्म से अलग कोई अन्य सत्ता नहीं होती; उनका अर्थ और कार्य इनसे संबंधित होते हैं।
एकद्रव्यवत्त्वान्न द्रव्यम्
अर्थ : केवल एक द्रव्य होने से किसी अन्य द्रव्य का अस्तित्व नहीं बनता। प्रत्येक द्रव्य स्वतंत्र है।
गुणकर्मसु च भावान्न कर्म न गुणः
अर्थ : गुण और कर्म में भाव होता है, लेकिन गुण स्वयं कर्म नहीं बनता और कर्म गुण नहीं बनता।
सामान्यविशेषाभावाच्च
अर्थ : सामान्य और विशेष के अभाव से ही किसी वस्तु का विशिष्ट अर्थ स्पष्ट होता है।
एकद्रव्यवत्त्वेन द्रव्यत्वं उक्तम्
अर्थ : केवल एक द्रव्य के आधार पर द्रव्यत्व की व्याख्या की जाती है।
सामान्यविशेषाभावेन च
अर्थ : सामान्य और विशेष के अभाव के आधार पर ही कोई वस्तु समझी जाती है।
गुणे भावाद्गुणत्वं उक्तम्
अर्थ : गुण में जो भाव निहित है, वही गुणत्व को सिद्ध करता है।
सामान्यविशेषाभावाच्च
अर्थ : सामान्य और विशेष की अनुपस्थिति के आधार पर गुण का भाव स्पष्ट होता है।
कर्मणि भावात्कर्मत्वं उक्तम्
अर्थ : कर्म में निहित भाव ही उसके कर्मत्व का कारण है।
सामान्यविशेषाभावाच्च
अर्थ : सामान्य और विशेष की अनुपस्थिति ही कर्म के वास्तविक भाव को प्रकट करती है।
सल्लिङ्गाविशेषाद्विशेषलिङ्गाभावाच्चैको भावः
अर्थ : किसी विशेष का केवल एक भाव होता है; किसी अन्य विशेष का उस भाव पर प्रभाव नहीं पड़ता।
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